अकाल मृत्यु से परंपरा का क्या आशय है
शास्त्रों में जो मृत्यु पूर्ण आयु भोगकर, वृद्धावस्था या रोग से होती है, उसे स्वाभाविक मृत्यु कहा गया है। जो मृत्यु उससे पहले आ जाए, या ऐसे रूप में आए जिसके लिए देह तैयार न रही हो, उसे अकाल मृत्यु या अपमृत्यु कहा जाता है। मार्ग की दुर्घटना, जल में डूबना, अग्नि, सर्पदंश, कोई आकस्मिक आघात, घर से दूर हुई मृत्यु, अपने ही हाथों समाप्त हुआ जीवन, या ऐसा बालक जो उस आयु से पहले चला गया जब सामान्य संस्कार आरंभ होते — ये सब इसी में आते हैं।
यह भी स्पष्ट कह देना उचित है कि यह वर्गीकरण क्या नहीं है। यह उस व्यक्ति पर कोई निर्णय नहीं है जो चला गया, और न ही परिवार पर कोई लांछन। परंपरा यहाँ केवल जाने के प्रकार का वर्णन कर रही है, जीवन को नहीं तौल रही। हर स्थिति में दिवंगत परिवार के अपने ही रहते हैं, और उनके प्रति भाव वही रहता है जो सदा था।
ऐसी स्थिति में केवल साधारण श्राद्ध पर्याप्त क्यों नहीं माना जाता
वार्षिक श्राद्ध, पितृ पक्ष का तर्पण और गया का अर्पण — ये सब पितरों के निमित्त हैं, अर्थात् उनके निमित्त जिन्होंने पितरों में अपना स्थान पा लिया है। परंपरा कहती है कि जीव यह स्थान मृत्यु के बाद की क्रियाओं से पाता है, जब वे अपने उचित क्रम में हों — दशगात्र और सपिंडीकरण, वही क्रम जिससे दिवंगत पहले जा चुके पितरों से जुड़ते हैं।
जहाँ मृत्यु अपने समय से पहले हुई हो, या जहाँ वह क्रम पूरा न हो सका हो, वहाँ परंपरा मानती है कि यह मिलन शेष रह जाता है। तब वार्षिक कर्म उस आधार पर होते रहते हैं जो स्वयं अधूरा है। इसीलिए बुजुर्ग कहते हैं कि ऐसी स्थिति में केवल साधारण श्राद्ध से बात नहीं बनती — इसलिए नहीं कि अर्पण छोटा है, बल्कि इसलिए कि उससे पहले का चरण अब भी खुला है।
इसलिए परिवार जो चाहता है, वह एक ही सरल बात है — कि दिवंगत को सामान्य पितर का स्थान मिल जाए। यह हो जाने पर आगे सब कुछ सामान्य हो जाता है — वार्षिक तिथि, पितृ पक्ष का तर्पण, गया का पिंड — सब उनके नाम से वैसे ही, जैसे घर के किसी भी बुजुर्ग के नाम से। यही पूरा उद्देश्य है, और यह उद्देश्य कोमल है।
प्रेत शिला — यही वह वेदी है जो इसी के लिए है
विष्णुपद से लगभग आठ किलोमीटर उत्तर — गाड़ी से बीस-पच्चीस मिनट — प्रेत शिला है — एक ऊँची पथरीली पहाड़ी, जिसके शिखर पर मंदिर और वेदी है। गया की सारी वेदियों में यही एक ऐसी है जो विशेष रूप से उनके लिए रखी गई है जिनकी मृत्यु परंपरा की दृष्टि से अकाल या अस्वाभाविक रही हो। जिन परिवारों पर ऐसा शोक है, उन्हें इसी कारण यहाँ लाया जाता है; और जिनके वंश में ऐसा प्रसंग नहीं, वे प्रायः यहाँ जाते ही नहीं।
पहाड़ी की तलहटी में ब्रह्म सरोवर है, जहाँ परिवार चढ़ाई से पहले स्नान कर पहला अर्पण करता है। फिर चढ़ाई आती है — शिला पर बनी पत्थर की लंबी सीढ़ियाँ; साथ आए बुजुर्गों को इसकी जानकारी पहले ही दे देनी चाहिए, और दोपहर के बजाय सुबह जल्दी चढ़ना कहीं सहज रहता है। ऊपर, उसी शिला पर, पंडाजी के दिए संकल्प के साथ दिवंगत के नाम से पिंड अर्पित होता है; यहाँ प्रायः सत्तू, तिल और जल का प्रयोग होता है, और अर्पण बहते जल में नहीं, पत्थर पर ही रखा जाता है।
परिक्रमा के क्रम में यह वेदी पहले रखी जाती है — विष्णुपद के मुख्य अर्पण और अक्षय वट के सुफल से पूर्व। परिवारों को इसका कारण सीधा-सा बताया जाता है: यहाँ का अर्पण मार्ग खोलने वाला माना गया है, जिससे आगे मुख्य वेदियों पर अर्पित पिंड उस आत्मा को मिले जो अब कहीं अटकी हुई न रहे। यदि परिवार तीन दिन की विस्तृत विधि कर रहा हो, तो प्रेत शिला प्रायः उत्तर की पहाड़ियों वाले दिन में आती है, राम शिला और राम कुंड के साथ।
नारायण बली — इस स्थिति की मुख्य विधि
प्रेत शिला एक वेदी है, अर्थात् अर्पण का स्थान। इस स्थिति के लिए जो विधि बताई गई है, वह नारायण बली है — और ये दोनों एक-दूसरे के विकल्प नहीं हैं; बहुत से परिवार दोनों करते हैं, पहले विधि और फिर गया की परिक्रमा में अर्पण।
संक्षेप में, नारायण बली में भगवान नारायण का आह्वान कर उस आत्मा के लिए गति की प्रार्थना की जाती है जिसकी मृत्यु अपने समय से पहले हुई हो, या जिसकी मृत्यु के बाद की क्रियाएँ पूरी न हो पाई हों। इसका केंद्र है गेहूँ के आटे और कुश से बनी एक प्रतीक देह; उसी में दिवंगत का आवाहन कर उस पर वे क्रियाएँ की जाती हैं जो अंतिम संस्कार के समय होनी चाहिए थीं, और उसके बाद पिंडदान तथा शेष श्राद्ध कर्म। यह एक बार की जाने वाली विधि है। वार्षिक श्राद्ध उसके बाद अपने ढंग से चलता रहता है।
इस विधि पर हमने एक अलग लेख में विस्तार से लिखा है — यह क्या है, किनके लिए बताई गई है, प्रतीक देह क्या होती है, कितना समय लगता है, कर्ता कौन हो सकता है, और नागबली तथा त्रिपिंडी श्राद्ध से इसका अंतर क्या है। यदि आपका परिवार इस पर विचार कर रहा है, तो इस संक्षिप्त परिचय से निर्णय लेने के बजाय वह पूरा लेख पढ़ लीजिए।
जब शरीर मिला ही नहीं, या क्रियाएँ हुई ही नहीं
कुछ परिवारों के हिस्से इसका और कठिन रूप आता है। कोई नदी जिसने शरीर लौटाया ही नहीं, कोई पहाड़ी मार्ग, कोई अग्निकांड, या ऐसा लापता होना जिसे अंततः मृत्यु मान लेना पड़ा। न दाह संस्कार हुआ, न अस्थियाँ मिलीं, न कोई ऐसा दिन आया जिस दिन कुछ किया जा सकता। वर्षों बाद भी परिवार यही कहता है — हम उनके लिए कुछ कर ही नहीं पाए।
परंपरा ने ठीक इसी स्थिति की कल्पना पहले से कर रखी है। आटे और कुश की प्रतीक देह उसी दशा के लिए है जहाँ शरीर न हो — उसी आकृति में दिवंगत का आवाहन कर उस पर स्नान, वस्त्र, तिल-जल, अग्नि संस्कार और आगे की सब क्रियाएँ क्रम से की जाती हैं। जिस परिवार को कभी शरीर मिला ही नहीं, उसके लिए प्रायः यही पहला अवसर होता है जब वह अपने हाथों से अपनों को विधिवत विदा कर पाता है — और अकसर यही वह क्षण होता है जब मन का सारा बोझ अपनी जगह पर बैठ जाता है।
यही बात उस स्थिति पर भी लागू है जहाँ दाह संस्कार तो हुआ, पर उसके बाद की क्रियाएँ कभी पूरी नहीं हुईं — परिवार बिखरा हुआ था, पास कोई ऐसा नहीं था जो विधि जानता हो, कोई लंबी बीमारी या कोई मुकदमा चल रहा था, या वे महीने बस यूँ ही सन्न से बीत गए। इसके लिए न कोई सफाई देनी है, न कोई खेद। यह बहुत सामान्य स्थिति है, और जो छूट गया उसे पूरा करने का विधान बताया गया है।
विदेश में हुई मृत्यु, या किसी और देश के नियमों से हुआ अंतिम संस्कार
विदेश में बसे परिवार, या जिनके यहाँ मृत्यु विदेश में हुई, यह प्रश्न बार-बार पूछते हैं। किसी का देहांत विदेश में हुआ; वहाँ के कानून के अनुसार दफ़नाना पड़ा, या दाह संस्कार किसी नियत समय पर किसी केंद्र में हो गया — न मंत्र, न कर्ता, न संकल्प; अस्थियाँ हफ़्तों बाद घर आईं, या वहीं प्रवाहित कर दी गईं, या लाई ही नहीं जा सकीं। परिवार सोचता रह जाता है कि अब जो भी किया जाए, वह गिना जाएगा या नहीं।
परंपरा का उत्तर स्थिर है। जो कानून या परिस्थिति के दबाव में हुआ, उसका दोष किसी पर नहीं आता; और शरीर का जो हुआ, गया का सरोकार अनुष्ठान के उस अंग से नहीं है। जो पूरा किया जा सकता है वह है क्रियाओं का क्रम — परिवार के अपने नाम और गोत्र से लिया गया संकल्प, क्रम से संपन्न कर्म, और यहाँ अर्पित पिंड। जहाँ अस्थियाँ मिल ही न सकी हों, वहाँ विधि प्रतीक देह पर वैसे ही चलती है जैसे शरीर न मिलने की दशा में।
व्यवहार में ऐसे परिवार प्रायः भारत की किसी एक यात्रा में गया आकर उन्हीं दिनों में सारी विधि पूरी कर लेते हैं — अकसर कर्ता स्वयं आता है और शेष परिवार फोन से जुड़ जाता है, या नहीं भी जुड़ पाता। इतना पर्याप्त है। संकल्प में नाम पूरे परिवार का लिया जाता है, चाहे सब उपस्थित हो पाए हों या नहीं।
परिवार वास्तव में क्या करे, क्रम से
पहला काम — वह सब जुटाइए जो केवल आपके परिवार के पास है: दिवंगत का नाम, कुल का गोत्र, मृत्यु की तिथि या दिनांक यदि ज्ञात हो, और पितरों के नाम जितनी पीढ़ियों तक घर में किसी को स्मरण हो। यदि सही तिथि कभी लिखी ही नहीं गई — ऐसा इन स्थितियों में प्रायः होता है — तो पंडाजी उपयुक्त तिथि निश्चित कर देते हैं; तिथि न होने के कारण रुकिए मत।
दूसरा, और यही सबसे आवश्यक है — किसी गयावाल तीर्थ पुरोहित से बात कीजिए और पूरी स्थिति साफ-साफ बताइए: मृत्यु किस प्रकार हुई, दाह संस्कार हुआ या नहीं, उसके बाद की क्रियाएँ पूरी हुईं या नहीं, यह कितने समय पहले की बात है, और तब से कोई कर्म हुआ है या नहीं। कुछ छिपाने या घुमा-फिराकर कहने की आवश्यकता नहीं। ये परिवार पीढ़ियों से ऐसी बातें सुनते आए हैं, इन पर उनकी कोई प्रतिक्रिया नहीं होती; और यही ब्योरा तय करता है कि कौन-सी विधि उचित है।
तीसरा, विधि और क्रम उन्हीं को तय करने दीजिए। यहाँ कोई एक बना-बनाया उत्तर नहीं है: परिस्थिति के अनुसार वे नारायण बली और उसके बाद गया श्राद्ध बता सकते हैं, या श्राद्ध जिसमें प्रेत शिला परिक्रमा में पहले रखी जाए, या त्रिपिंडी श्राद्ध जहाँ वर्षों के वार्षिक कर्म भी छूटे हों, या इनका कोई मेल। कौन-सी वेदियाँ, कौन-सा दिन, कितने दिन और कौन-सी सामग्री — यह सब उसी बातचीत से निकलता है। यात्रा की तिथि विधि तय होने के बाद बाँधिए, पहले नहीं।
चौथा, कर्ता तय कर लीजिए और वह दिन खाली रखिए। परंपरा से पुत्र, और पुत्र न हो तो पौत्र, भाई, भतीजा, दौहित्र या कुल का कोई निकट संबंधी; बेटी भी यह कर्म कर सकती है, और गया में इसके पीछे माता सीता का उदाहरण स्वयं खड़ा है। पूरी सुबह खाली रखिए, नदी स्नान के लिए एक जोड़ी सूखे वस्त्र साथ रखिए, और यदि परिक्रमा में प्रेत शिला है तो चढ़ाई की तैयारी रखिए।
किसी परिवार को लौटाया नहीं जाता
ऐसा शोक लेकर आने वाले परिवार प्रायः यह मन में लिए आते हैं कि कहीं मना न कर दिया जाए, या यह न कह दिया जाए कि आपका मामला कठिन है। ऐसा कुछ नहीं होता। यह विधि हर परिवार के लिए है, चाहे मृत्यु किसी भी प्रकार हुई हो — दुर्घटना, जल-समाधि, अग्नि, आत्महत्या, घर से दूर हुई मृत्यु, या ऐसा शरीर जो कभी मिला ही नहीं। जब से गया है तब से यहाँ ऐसे परिवार आते रहे हैं, और पंडाजी बस इतना पूछते हैं कि क्या हुआ था, और फिर विधि आरंभ कर देते हैं।
और यहाँ आते समय एक बात मन में रखने योग्य है। यह कर्म भय से नहीं किया जाता, और परंपरा किसी परिवार से यह नहीं कहती कि वह अपराधबोध लेकर गया आए। यह स्नेह से और कर्तव्य से किया जाता है — क्योंकि अपनों के लिए अब भी कुछ किया जा सकता है, और उसे अपने हाथों से कर पाना ही इस विधि का अर्थ है।