अगर अस्थि आज भी घर में रखी है, तो ऐसा केवल आपके साथ नहीं हुआ
कपड़े में लिपटा एक छोटा पात्र — अलमारी के ऊपरी खाने में, किसी सूटकेस के पीछे, स्टोर रूम में रखा हुआ। दस वर्ष, कभी बीस। घर में कोई इसे ज़ोर से कहता नहीं, और सबको पता रहता है कि वह वहीं है। यदि यह आपके घर की बात है, तो सबसे पहले इतना सुन लीजिए — ऐसा जितना लोग स्वीकार करते हैं, उससे कहीं अधिक परिवारों के साथ होता है, और इसे अब भी ठीक किया जा सकता है। इस लेख का पूरा उद्देश्य यही है।
कारण प्रायः बहुत साधारण ही होते हैं। बड़ा बेटा परदेस में था और यात्रा टलती चली गई। घर में मनमुटाव हो गया और कोई निर्णय लेने वाला बनना नहीं चाहता था। किसी ने कह दिया कि तिथि ठीक नहीं है, और फिर वर्ष निकल गया। महामारी के दिनों में तो यात्रा ही संभव नहीं थी, और हज़ारों परिवारों के पास अस्थि रखी रह गई, कहीं जाने का कोई रास्ता नहीं था। और सबसे अधिक बार तो बात केवल इतनी होती है कि घर में किसी को पता ही नहीं था कि आगे क्या करना है, और पूछने में संकोच होता रहा।
बहुत से परिवार गया इसी बोझ के साथ पहुँचते हैं, मानो कोई अपराध हो गया हो। यह कहना ज़रूरी है कि हमारी परंपरा छूटे हुए कर्तव्य को वैसे नहीं देखती जैसे हम स्वयं को देखते हैं। वह उसे अब भी शेष खड़ा कर्तव्य मानती है, और द्वार खुला रखती है। देर हो जाने का सही उत्तर लज्जा नहीं है — तिथि तय कीजिए और उसे पूरा कर दीजिए।
अस्थि विसर्जन क्या है और उससे क्या सधता है
दाह संस्कार के बाद जो शेष रहता है, वही अस्थि है — चिता से परिवार द्वारा चुनकर एकत्र किया गया अस्थि-अवशेष। अस्थि विसर्जन का अर्थ है उसी को संकल्प और मंत्र के साथ, उस व्यक्ति के नाम से, बहते जल को लौटा देना। यह वह अंतिम कार्य है जो परिवार जाने वाले की देह के साथ करता है।
परंपरा मानती है कि यह देह पंचतत्वों से बनी है, और हर तत्व अपने स्थान को लौटाया जाता है। अग्नि अपना भाग ले लेती है; शेष जल लेता है। जब तक यह लौटाना नहीं होता, तब तक अंत्येष्टि का एक अंग शेष माना जाता है, और परंपरा की दृष्टि में दिवंगत का एक सूक्ष्म बंधन पीछे छूटी हुई वस्तु से बना रहता है।
इसलिए विसर्जन न कोई औपचारिकता है, न किसी वस्तु से छुटकारा। यह मुक्ति है, जो परिवार अपने हाथों से देता है। और यह ध्यान देने योग्य है कि इससे जीवितों को भी क्या मिलता है। जिस घर में वर्षों से अस्थि रखी हो, वहाँ एक वाक्य अधूरा पड़ा रहता है। उसे जल में प्रवाहित करते ही वह वाक्य पूरा हो जाता है, और परिवार उसी शाम इसे अनुभव करता है।
इसकी कोई समय-सीमा नहीं है
ऐसा हर परिवार सबसे पहले यही पूछता है, प्रायः धीमी आवाज़ में — इतने वर्ष बीत गए, अब तो बहुत देर हो गई होगी? नहीं हुई। अस्थि विसर्जन और श्राद्ध, दोनों वर्षों बाद भी किए जा सकते हैं, और तब जो विधि होती है वह पूरी विधि होती है, कोई छोटा-सा विकल्प नहीं।
हमारे शास्त्र आदर्श परिवारों के लिए नहीं लिखे गए। वे उन लोगों ने लिखे जो जानते थे कि पुत्र परदेस जाते हैं, धन चुक जाता है, घरों में मतभेद होते हैं, अकाल और महामारियाँ आती हैं। यही कारण है कि परंपरा ने अपने समय पर छूट गए कर्मों के लिए मार्ग दिया है, द्वार बंद नहीं किया। जहाँ कोई कर्तव्य छूटा है, वहाँ उसे फिर से उठा लेने की व्यवस्था बताई गई है।
गया स्वयं इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है। यहाँ परिवार तीस वर्ष पहले गुज़रे माता-पिता के लिए आते हैं, और उन प्रपितामहों के लिए भी जिन्हें उन्होंने कभी देखा नहीं। किसी को लौटाया नहीं जाता, किसी से यह नहीं कहा जाता कि अवसर निकल गया। देर होना हानि नहीं है — वह केवल शेष रह गया कर्म है, जिसे अब पूरा करना है।
कहाँ किया जाता है — गया में फल्गु तट
अस्थि विसर्जन किसी पवित्र प्रवाहमान जल में किया जाता है, और परिवार अपने क्षेत्र और परंपरा के अनुसार अलग-अलग स्थान चुनते हैं — हरिद्वार, प्रयागराज, काशी, या पास की कोई पवित्र नदी। गया की फल्गु भी उन्हीं स्थानों में है, और वर्षों से रुका हुआ यह कर्म लेकर आने वाले बहुत से परिवार यहीं आते हैं।
इसका कारण सीधा और व्यावहारिक है। गया पिंडदान का स्थान है, और जिस परिवार ने वर्षों प्रतीक्षा की हो, उसके यहाँ प्रायः दोनों बातें साथ ही शेष रहती हैं — अस्थि विसर्जित नहीं हुई, और श्राद्ध भी नहीं हुआ। फल्गु तट पर विसर्जन संपन्न कराकर उसी यात्रा में, उसी प्रातः, उसी व्यक्ति के नाम के संकल्प के साथ पिंडदान भी हो जाता है। एक ही यात्रा में वह सब पूरा हो जाता है जो वर्षों से अधूरा पड़ा था।
उस दिन का क्रम तीर्थ पुरोहित तय करते हैं — सामान्यतः स्नान और संकल्प, फिर तर्पण, नदी में विसर्जन, और उसके बाद पिंड अर्पण तथा शेष विधि। यह क्रम आपको स्वयं बैठकर सोचना नहीं है। आपको केवल इतना करना है कि पूरी स्थिति उन्हें पहले से बता दें।
यदि अस्थि घर में रखी है — उसे कैसे रखें और कैसे लाएँ
यात्रा तक उसे वैसे ही रहने दीजिए जैसे अब तक रखी है — स्वच्छ वस्त्र में लिपटी हुई, ऐसे स्थान पर जहाँ आवाजाही न हो और जहाँ और सामान न रखा जाता हो। न उसकी नित्य पूजा आवश्यक है, न उसे पूजा-स्थान में ले जाना आवश्यक है। स्वच्छ और अविचलित रखना ही पर्याप्त है, और अब तक जो वर्ष बीत चुके हैं उनके लिए कुछ अलग से सुधारने की आवश्यकता नहीं।
यात्रा के लिए अस्थि को आदर के साथ ले जाया जाता है — स्वच्छ मिट्टी या धातु के पात्र में, या नए बिना सिले वस्त्र में बाँधकर, अपने पास रखते हुए, सामान में डालकर नहीं। परंपरा से उसे रसोई में नहीं ले जाते, और बहुत से परिवार उसे श्वेत या केसरिया वस्त्र में लपेटकर रखते हैं। यदि हवाई जहाज़ या रेल से आना हो, तो यात्रा की व्यवस्था के बारे में संबंधित सेवा से पहले ही पूछ लीजिए, ताकि यात्रा वाले दिन कोई असमंजस न रहे।
इन सब से अधिक महत्व की एक बात है — तीर्थ पुरोहित को आने से पहले ही बता दीजिए कि आप अस्थि लेकर आ रहे हैं, और लगभग कितने समय से वह घर में रखी है। जिस दिन विसर्जन भी होना हो, उस दिन की विधि केवल पिंडदान वाले दिन से भिन्न रूप से बनाई जाती है, और यह बात उन्हें क्रम तय करते समय चाहिए — उस प्रातः घाट पर पहुँचकर नहीं। पहली ही बातचीत में यह कह दीजिए।
यदि अस्थि खो गई हो, या कभी उठाई ही न गई हो
यह स्थिति पहली से भी अधिक सामान्य है, और परिवारों को इसे कह पाना कहीं अधिक कठिन लगता है। अस्थि श्मशान में ही छूट गई और कोई लौटकर लेने नहीं गया। किसी का देहांत घर से दूर, अनजान लोगों के बीच हुआ और कुछ सौंपा ही नहीं गया। कलश किसी रिश्तेदार के घर रखा था और वह घर बिक गया। महामारी के दिनों में तो अनेक स्थानों पर परिवार कुछ भी प्राप्त नहीं कर सके।
यह बात स्पष्ट सुन लीजिए — विधि आज भी आपके लिए खुली है। अस्थि के बिना भी दिवंगत का श्राद्ध और पिंडदान संपन्न हो सकता है। विधि जिस बात पर टिकी है वह संकल्प है — उस व्यक्ति का नाम, गोत्र, और वह कर्ता जो खड़ा होकर संकल्प बोलता है। अर्पण उसी नाम के सहारे पहुँचता है। वह देह-अवशेष से नहीं जाता, और उसकी पूर्णता उन पर निर्भर नहीं है।
गया में हर वह परिवार याद कीजिए जो चार पीढ़ी पहले के प्रपितामह के नाम पिंड अर्पित करता है। उनकी अस्थि कहीं नहीं है, और सौ वर्ष से नहीं है। फिर भी उनका कर्म पूरी विधि से होता है और पूर्ण माना जाता है। यदि आपके पिता या माता की अस्थि नहीं रखी जा सकी, तो आप ठीक उसी स्थिति में हैं। पुरोहित जी को जो हुआ वह बता दीजिए, और विधि आगे बढ़ जाती है।
जहाँ वर्षों की देर हो, वहाँ प्रायश्चित संकल्प जोड़ा जा सकता है
जहाँ कोई कर्म अपने उचित समय से बहुत बाद हो रहा हो, वहाँ तीर्थ पुरोहित मुख्य विधि आरंभ करने से पहले देर के निमित्त एक अतिरिक्त संकल्प या कोई संक्षिप्त कर्म जोड़ सकते हैं। हमारी परंपरा में इस सामान्य व्यवस्था को प्रायश्चित कहा जाता है — अर्थात जो छूट गया, उसे ठीक कर लेना।
क्या जोड़ा जाएगा, यह आपके परिवार की परिस्थिति पर निर्भर करता है, और यह पुरोहित जी ही सब सुनकर तय करते हैं — कितना समय बीता है, देहांत किस प्रकार हुआ, वार्षिक श्राद्ध होता रहा या नहीं। किसी विशेष विधि का नाम ढूँढ़ने मत बैठिए, और अपनी स्थिति किसी पुरोहित को बताए बिना, फ़ोन पर ही कोई यह कह दे कि पहले अमुक बड़ा अनुष्ठान अनिवार्य है — तो उसे स्वीकार मत कीजिए।
एक बात यहाँ बिना किसी संदेह के कह देनी चाहिए। इस प्रसंग में प्रायश्चित कोई दंड नहीं है, न परिवार पर उसकी चूक के लिए लगाया गया कोई अर्थदंड। यह परंपरा का अपना तरीका है कि हुई देर को विधिवत स्वीकार कर लिया जाए, ताकि उसके बाद मुख्य कर्म ऐसे संपन्न हो सके मानो अपने उचित क्रम में हो रहा हो। इसका प्रयोजन आगे का मार्ग साफ़ करना है, आपको कुछ सुनाना नहीं।
अब आगे क्या करें
सबसे पहले वह जुटा लीजिए जो केवल आपका परिवार दे सकता है — दिवंगत का नाम, गोत्र यदि घर में किसी को स्मरण हो, देहांत लगभग कब और किस प्रकार हुआ, और उसके बाद कोई श्राद्ध हुआ है या नहीं। यदि अस्थि घर में है, तो यह भी देख लीजिए कि लगभग कितने समय से रखी है। जानकारी अधूरी हो तो यह सामान्य बात है, इससे कुछ रुकता नहीं।
फिर यह तय कीजिए कि कर्ता कौन होगा और परिवार से और कौन आएगा, और लौटने की टिकट के हिसाब से दिन बाँधने के बजाय पूरी सुबह खाली रखिए। इससे आगे विधि की योजना आप स्वयं मत बनाइए। क्रम क्या रहेगा, कौन-से स्थल होंगे, और देर के निमित्त कुछ जोड़ना है या नहीं — यह सब तीर्थ पुरोहित आपकी स्थिति जानने के बाद तय करते हैं।
इसमें कहीं भी असमंजस हो, तो कुछ भी तय करने से पहले गया पंडाजी से बात कर लीजिए। अपनी स्थिति अपने शब्दों में बता दीजिए — कितने वर्ष हो गए, अस्थि आपके पास है या खो गई, कौन-कौन आ सकता है। फ़ोन पर मार्गदर्शन निःशुल्क है और कोई बाध्यता नहीं। परिवार वर्षों तक यह बात मन में लिए बैठे रहते हैं; प्रायः एक बातचीत ही यह देखने के लिए पर्याप्त होती है कि यह पूरा हो सकता है, और विधिपूर्वक हो सकता है।