एक तीर्थ, जिसका नाम एक असुर पर है
भारत के अधिकतर तीर्थ किसी नदी, किसी देवता या किसी ऋषि के नाम से जाने जाते हैं। गया इस मामले में अलग है — इसका नाम एक असुर पर पड़ा। वायु पुराण का एक पूरा भाग, जिसे गया माहात्म्य कहते हैं, यही बात समझाता है। और यह किसी हार की कथा नहीं है। यह उस भक्त की कथा है जिसकी तपस्या इतनी प्रबल थी कि देवताओं को स्वयं उसके पास आना पड़ा, और जिसने अपना शरीर ऐसा अर्पित कर दिया कि वही शरीर आज तीर्थयात्री के पैरों तले की भूमि है।
पहली बार गया आ रहे परिवार के लिए यह कथा विधि से पहले जान लेना अच्छा है। इसी से समझ आता है कि पिंड यहीं क्यों अर्पित किया जाता है, नगर के बीच बना मंदिर विष्णुपद क्यों कहलाता है, और पुराण गया के बारे में इतने विश्वास से क्यों कहते हैं — जितना किसी और क्षेत्र के लिए नहीं कहते।
वह असुर, जो विष्णु का भक्त था
पुराणों में गयासुर का वर्णन विशाल शरीर वाले असुर के रूप में मिलता है, पर उसका आचरण संहारक का नहीं था। कोलाहल पर्वत पर उसने ऐसी कठोर तपस्या की कि तीनों लोक काँप उठे — युगों तक खड़े रहकर, मन विष्णु में लगाए हुए। यहाँ असुर होना उसके कुल का परिचय है, चरित्र का निर्णय नहीं; उसकी भक्ति सच्ची थी और अटूट थी।
प्रसन्न होकर भगवान विष्णु प्रकट हुए और वर माँगने को कहा। गयासुर ने वह माँगा जो पहले किसी ने नहीं माँगा था — कि उसका शरीर सृष्टि में सबसे पवित्र हो जाए, तीर्थों से, देवताओं से और ऋषियों से भी अधिक पवित्र; जो उसे देख भर ले या छू भर ले, वह पापों से मुक्त होकर मोक्ष पा जाए। विष्णु ने यह वर दे दिया।
वरदान जिसने व्यवस्था हिला दी
वरदान ठीक वैसे ही फलित हुआ जैसा माँगा गया था। लोग गयासुर के पास आते, उसे देखते, छूते और सीधे वैकुंठ चले जाते — पुण्यात्मा भी और पापी भी, बिना कर्मों का हिसाब चुकाए। यमलोक खाली होने लगा। जिस व्यवस्था से मनुष्य को अपने कर्मों का फल मिलता है, वह चुपचाप बिखरने लगी।
देवता यमराज को साथ लेकर ब्रह्मा जी के पास पहुँचे। बात कठिन थी। वरदान स्वयं विष्णु ने दिया था, इसलिए उसे लौटाया नहीं जा सकता था; और गयासुर ने ऐसा कोई अपराध भी नहीं किया था कि उसे दंड दिया जाए। जो करना था, उसकी अपनी सहमति से ही करना था।
ब्रह्मा जी ने शरीर माँगा
ब्रह्मा जी स्वयं गयासुर के पास आए और उससे दान माँगा। एक महायज्ञ के लिए इतनी पवित्र भूमि चाहिए थी, और सृष्टि में गयासुर के अपने शरीर से पवित्र कुछ था ही नहीं। उन्होंने असुर से कहा कि वह लेट जाए और तब तक स्थिर रहे जब तक देवता उसके ऊपर यज्ञ पूरा न कर लें।
गयासुर तुरंत मान गया — न कोई बहस, न कोई शर्त। वह पृथ्वी पर लेट गया, सिर उत्तर की ओर और पैर दक्षिण की ओर। कहते हैं उसका शरीर पाँच कोस भूमि में फैला था — वही क्षेत्र, जिसमें आज भी तीर्थयात्री एक स्थल से दूसरे स्थल तक चलते हैं। उसकी पीठ पर यज्ञ आरंभ हुआ, ब्रह्मा जी ऋत्विक बने, देवता अपने-अपने स्थान पर बैठे, और तीर्थों को भी वहाँ उपस्थित होने का निमंत्रण दिया गया।
काँपता शरीर और विष्णु का चरण
यज्ञ चलते-चलते गयासुर का शरीर हिलने लगा। कुछ कथाएँ कहती हैं कि यह उसके भीतर की प्रचंड शक्ति थी, कुछ कहती हैं कि देवताओं ने परीक्षा लेने के लिए भूमि को डोलने दिया। कारण जो भी हो, हिलती भूमि पर यज्ञ पूरा नहीं हो सकता। यमराज धर्मशिला ले आए — धर्मदेव की पुत्री की तपस्या से प्रकट हुई वह शिला — और उसे असुर के ऊपर रखा गया, ताकि वह स्थिर हो जाए। पर इतने से भी बात नहीं बनी।
तब स्वयं भगवान विष्णु आए और उन्होंने उसी शिला पर अपना दायाँ चरण रखा, जिससे गयासुर धरती में दृढ़ता से टिक गया। शरीर शांत हुआ और यज्ञ पूरा हुआ। उसी चरण का चिह्न नगर के मुख्य मंदिर में स्थापित है — विष्णुपद, पत्थर पर अंकित वह चरण-चिह्न, जिसके सामने आज भी परिवार अपना अर्पण करते हैं।
गयासुर ने बदले में क्या माँगा
यज्ञ पूरा होने पर भगवान विष्णु प्रसन्न हुए और गयासुर से कहा कि जो चाहे माँग ले। असुर ने न तो मुक्त होने की प्रार्थना की, न अपने लिए कुछ माँगा। उसने यह माँगा कि जो भूमि उसका शरीर बन चुकी है, वही भूमि पितरों की मुक्ति का स्थान बने — जो कोई यहाँ श्राद्ध करे और अपने माता-पिता तथा उनसे पहले की पीढ़ियों के लिए पिंड अर्पित करे, उन पितरों को वह गति मिले जो किसी और कर्म से नहीं मिलती।
उसने यह भी माँगा कि विष्णु और सभी देवता सदा उसी भूमि में विराजमान रहें, और वह क्षेत्र उसी के नाम से जाना जाए। सब कुछ स्वीकार हुआ। इसीलिए यह क्षेत्र गया कहलाता है, गया माहात्म्य इसे मोक्ष-भूमि कहता है, और पुराण कहते हैं कि यहाँ किया गया अर्पण पिता पक्ष की सात और माता पक्ष की सात पीढ़ियों तक पहुँचता है।
इस दृष्टि से देखें तो असुर कोई खलनायक नहीं है जिसे चरण के नीचे कुचल दिया गया हो। वह वही भक्त है जिसकी अंतिम इच्छा दूसरों के पितरों का कल्याण थी — और जिसका शरीर ही वह भूमि है जहाँ यह कल्याण होता है।
आज गया में यह कथा कहाँ दिखती है
यह क्षेत्र कोई कल्पना नहीं है। कथा उन्हीं स्थानों में फैली है जहाँ परिवार एक-दो दिन में जाता है। विष्णुपद मंदिर में धर्मशिला पर वही चरण-चिह्न है। पास ही बहती फल्गु में तर्पण होता है — वही नदी, जिसे परंपरा रेत के नीचे बहती हुई याद करती है। अक्षय वट, वह अविनाशी वट वृक्ष, जहाँ परंपरा के अनुसार क्रम पूरा होता है और बुजुर्गों का आशीर्वाद लिया जाता है।
पाँच कोस के इस क्षेत्र में और भी वेदियाँ पारंपरिक सूची में गिनी जाती हैं, और गयावाल पंडाजी — वे पुरोहित परिवार जिनके पास पीढ़ियों से इस क्षेत्र की विधि का अधिकार है — हर परिवार की स्थिति देखकर उसका मार्ग और क्रम तय करते हैं। पहली बार आने वाले को पूरी सूची याद रखने की जरूरत नहीं। इतना जान लेना काफी है कि हर पड़ाव इसी कथा के शरीर पर बसा है।
पिंडदान करने वाले परिवार के लिए इसका अर्थ
गया में पिंडदान एक कर्तव्य है, शोक नहीं। धर्म में मनुष्य पर तीन ऋण बताए गए हैं, और उनमें से एक है पितृ-ऋण — उन लोगों का ऋण जिनसे हमें शरीर, नाम और संसार में स्थान मिला। यह ऋण श्राद्ध से चुकाया जाता है, और परंपरा मानती है कि गया में यह जिस तरह चुकता है, वैसा कहीं और नहीं — कारण वही वरदान है जो गयासुर ने माँगा था। यही वजह है कि परिवार मृत्यु के वर्षों, कभी-कभी दशकों बाद भी यहाँ आते हैं, और इसीलिए बड़े इंतजाम से कहीं अधिक महत्व इस बात का है कि विधि बिना जल्दबाजी के, ठीक से पूरी हो।
परिवार का एक सदस्य कर्ता बनता है और संकल्प लेता है; बाकी लोग उसके साथ खड़े रहते हैं। अर्पण सीधा-सादा होता है — चावल या जौ के आटे का पिंड, तिल, जल, कुश, और ऊँचे स्वर में पितरों के नाम। यह कर्म अकसर पितृ पक्ष में किया जाता है, जब सबसे अधिक भीड़ रहती है, पर गया का माहात्म्य उन पंद्रह दिनों तक सीमित नहीं है। यहाँ श्राद्ध पूरे वर्ष किया जा सकता है।
इस दृष्टि से देखें तो यह यात्रा भारी नहीं लगती। यह एक परिवार का उन लोगों की ओर से काम पूरा करना है जो स्वयं पूरा नहीं कर सकते — उसी भूमि पर खड़े होकर, जो पुराणों के अनुसार इसी काम के लिए दी गई थी। वह भूमि गया है — और इसीलिए गया में होने वाला पिंडदान इन्हीं वेदियों पर होता है, कहीं और नहीं।