गया की 45 पिंडदान वेदियाँ: स्थान और पूजा का क्रम

गयाजी की प्रमुख वेदियों का परिचय और पुनपुन से अक्षयवट तक विस्तृत गया श्राद्ध का तिथि-क्रम जानें।

8 मिनटलेखक Vayu Pind Daanअंतिम संशोधन 2026-10-31समीक्षक पंडित ओमकार नाथ अग्निवार, गयावाल तीर्थ पुरोहित, गया - गया श्राद्ध, पिंडदान, तर्पण और पितृ कर्मों में 40+ वर्षों का अनुभव
5.0/5119 रिव्यूGoogle पर जाँचें

4,100+पूजाएँ संपन्न

1,00,000+परिवारों की सेवाहमारे तीर्थ पुरोहितों द्वारा

गयाजी की वेदियों पर पिंडदान

गया में पितरों के निमित्त पिंडदान, तर्पण और श्राद्ध अलग-अलग वेदियों पर किए जाते हैं। फल्गु, विष्णुपद और अक्षयवट प्रमुख स्थल हैं। विस्तृत गया श्राद्ध में प्रेतशिला, पंचतीर्थी, धर्मारण्य और अन्य निर्धारित वेदियों का क्रम भी आता है।

तीन दिन की व्यवस्था में फल्गु से शुरू होकर 45 वेदियों का क्रम पूरा होता है। सत्रह दिन का कार्यक्रम पुनपुन से शुरू होता है। इसमें निर्धारित तर्पण स्थल भी आते हैं और अंतिम श्राद्ध तथा सुफल अक्षयवट पर होता है। नीचे इसका पारंपरिक तिथि-क्रम दिया गया है।

गया श्राद्ध का तिथि-क्रम

यह तिथि के अनुसार पूजा का क्रम है; हर पंक्ति अलग दिन या अलग वेदी नहीं है। कभी दो तिथियों का कर्म एक ही दिन होता है।

तिथिस्थान और कर्म
भाद्रपद शुक्ल चतुर्दशीपुनपुन में प्रवेश श्राद्ध।
भाद्रपद पूर्णिमाफल्गु तट पर स्नान, तर्पण और श्राद्ध।
आश्विन कृष्ण प्रतिपदाब्रह्मकुंड, प्रेतशिला, रामशिला और रामकुंड में श्राद्ध; इस क्षेत्र का काकबलि कर्म।
कृष्ण द्वितीयापंचतीर्थी: उत्तरमानस, उदीची, कनखल, दक्षिणमानस और जिह्वालोल; गदाधर जी का पूजन।
कृष्ण तृतीयासरस्वती तीर्थ, मतंगवापी और धर्मारण्य में कर्म; बोधितरु के दर्शन।
कृष्ण चतुर्थीब्रह्मसरोवर में श्राद्ध और काकबलि; तारकब्रह्म के दर्शन तथा आम्रसिंचन।
कृष्ण पंचमीविष्णुपद, रुद्रपद और ब्रह्मपद पर श्राद्ध।
कृष्ण षष्ठीकार्तिकपद, दक्षिणाग्निपद, गार्हपत्याग्निपद और आहवनीयाग्निपद।
कृष्ण सप्तमीसूर्यपद, चंद्रपद, गणेशपद, संध्याग्निपद, आवसथ्याग्निपद और दधीचिपद।
कृष्ण अष्टमीकण्वपद, मतंगपद, क्रौंचपद, अगस्त्यपद, इंद्रपद और कश्यपपद; गजकर्ण में दुग्ध तर्पण।
कृष्ण नवमीफल्गु के पूर्वी तट पर रामगया और सीताकुंड में श्राद्ध।
कृष्ण दशमीगयाशिर और गयाकूप में श्राद्ध।
कृष्ण एकादशीमुंडपृष्ठ, आदिगया और धौतपद में श्राद्ध।
कृष्ण द्वादशीभीमगया, गोप्रचार और गदालोल में श्राद्ध।
कृष्ण त्रयोदशीविष्णु जी का पूजन और फल्गु में दुग्ध तर्पण।
कृष्ण चतुर्दशीवैतरणी में तर्पण और निर्धारित दान।
अमावस्याअक्षयवट पर श्राद्ध, शैय्यादान और सुफल।

काकबलि और फल्गु का उल्लेख दो बार क्यों है?

प्रतिपदा को प्रेतशिला–रामशिला क्षेत्र के कर्म में काकबलि होती है। चतुर्थी को ब्रह्मसरोवर के कर्म के साथ काकबलि, तारकब्रह्म दर्शन और आम्रसिंचन का क्रम है। स्थान और तिथि से दोनों कर्मों की पहचान होती है।

पूर्णिमा को फल्गु पर स्नान, तर्पण और श्राद्ध होता है। त्रयोदशी को विष्णु पूजन के साथ फल्गु में दुग्ध तर्पण का क्रम है। प्रेतशिला का ब्रह्मकुंड और चतुर्थी के क्रम का ब्रह्मसरोवर भी अलग नामों से दिए गए हैं।

विष्णुपद और पद-वेदियों का क्रम

विष्णुपद क्षेत्र का क्रम पंचमी को विष्णुपद, रुद्रपद और ब्रह्मपद से शुरू होता है। षष्ठी, सप्तमी और अष्टमी को क्रमशः चार, छह और छह पद-वेदियों पर कर्म होता है। अष्टमी के पद-कर्म के साथ गजकर्ण में दुग्ध तर्पण भी होता है।

प्रमुख स्थलों के क्षेत्र

उत्तर की ओर ब्रह्मकुंड, प्रेतशिला, रामशिला और रामकुंड का क्रम है। उत्तरमानस, सूर्यकुंड क्षेत्र के उदीची–कनखल–दक्षिणमानस और जिह्वालोल मिलकर पंचतीर्थी का क्रम बनाते हैं। बोधगया की ओर सरस्वती तीर्थ, मतंगवापी, धर्मारण्य और बोधितरु आते हैं।

फल्गु के पूर्वी तट पर रामगया और सीताकुंड हैं। गयाशिर, गयाकूप, मुंडपृष्ठ, आदिगया, धौतपद, भीमगया, गोप्रचार और गदालोल का कर्म आगे के क्रम में आता है।

पिंडदान के बाद सूर्य कुंड, गया पर यजमान
पिंडदान के बाद सूर्य कुंड, गया पर यजमान

कितने दिन का गया श्राद्ध चुनें?

एक दिन के गया पिंडदान में प्रमुख स्थल फल्गु, विष्णुपद और अक्षयवट आते हैं। तीन दिन का गया श्राद्ध फल्गु से शुरू होकर 45 वेदियों का विस्तृत क्रम पूरा करता है। सत्रह दिन का वृहद गया श्राद्ध पुनपुन से शुरू होकर ऊपर दिए तिथि-क्रम के अनुसार अक्षयवट पर पूरा होता है।

पूरी सूची का अर्थ यह नहीं कि हर परिवार को पूरा क्रम करना है। उपलब्ध दिन और परिवार की परिस्थिति हमें बताएँ। पंडित जी के साथ रास्ते समझने और चुनी हुई यात्रा, शामिल व्यवस्था तथा कुल खर्च बुकिंग से पहले लिखित में तय करने में मदद करेंगे।

संदर्भ स्रोत

गया में पिंडदान की तस्वीरें →

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

क्या तालिका की हर पंक्ति अलग वेदी है?
नहीं। एक पंक्ति में कई वेदियाँ, पहले आए किसी स्थल पर दोबारा कर्म या तर्पण जैसी विधि हो सकती है। यह पूजा का क्रम है, 45 अलग-अलग स्थलों की गिनती नहीं।
क्या हर परिवार को सभी 45 वेदियों पर जाना होता है?
नहीं। प्रमुख स्थलों की पूजा, तीन दिन का विस्तृत क्रम और सत्रह दिन का अनुष्ठान अलग व्यवस्थाएँ हैं। परिवार की परंपरा और उपलब्ध समय के अनुसार विधि चुनी जाती है।
सत्रह दिन के गया श्राद्ध में अंतिम कर्म कहाँ होता है?
अक्षयवट पर अंतिम श्राद्ध और सुफल के साथ।

45-वेदी श्राद्ध (3 दिन) की बुकिंग

यह पूजा आपके परिवार के लिए उपयुक्त है या नहीं, हमारे पंडित जी से इसकी पुष्टि कराएँगे। तैयारी, शामिल व्यवस्था और कुल खर्च बुकिंग से पहले लिखित में बताएँगे, ताकि गया पहुँचकर आपको सब नए सिरे से तय न करना पड़े।

आगे पढ़िए

+91 77177 85996WhatsApp