यह उलझन लगभग हर परिवार के सामने आती है
श्राद्ध की तैयारी बैठकर करने लगते हैं तो पता चलता है कि परिवार के पास बस एक ही जानकारी है — मृत्यु प्रमाणपत्र पर लिखी अंग्रेज़ी तारीख़। 14 मार्च। 2 नवंबर। तिथि किसी ने लिखी नहीं, जिन बुज़ुर्ग को ज़बानी याद रहती थी वे स्वयं नहीं रहे, और जिन रिश्तेदारों को शायद पता हो वे दूर-दूर बिखरे हैं। ऐसे में परिवार वही करता है जो सीधा लगता है — हर साल उसी अंग्रेज़ी तारीख़ पर कर लेता है।
यह न कोई मामूली चूक है, न शर्म की बात। आज अधिकतर घरों में यही होता है, और इसलिए होता है कि कैलेंडर की बात किसी ने सीधे-सादे शब्दों में समझाई ही नहीं। यह लेख वही करता है। इसे पढ़ने के बाद आप अंग्रेज़ी तारीख़ से अपने घर की श्राद्ध तिथि तक पहुँच सकेंगे — या कम से कम यह जान लेंगे कि किससे पूछना है।
पढ़ते समय एक बात ध्यान रखिए। श्राद्ध शोक का अवसर नहीं, अपने पूर्वजों के प्रति कर्तव्य है। सही दिन निकालना उसी कर्तव्य को ध्यान से निभाने का हिस्सा है — जैसे किसी बड़े के प्रति अपनी ज़िम्मेदारी में हम सावधानी बरतते हैं।
दो कैलेंडर साथ-साथ चलते हैं, और वे मिलते नहीं
दीवार पर टँगा अंग्रेज़ी कैलेंडर सौर है। वह पृथ्वी की सूर्य के चारों ओर की यात्रा गिनता है, जो लगभग 365 दिन से कुछ अधिक की होती है, और उसके महीने उस वर्ष के बँधे-बँधाए टुकड़े भर हैं। हिंदू पंचांग कुछ और ही गिनता है — चंद्रमा को। एक मास एक अमावस्या से अगली अमावस्या तक चलता है, और यह चक्र लगभग साढ़े उनतीस दिन का होता है, तीस या इकतीस का नहीं।
इसलिए बारह चंद्र मास लगभग 354 दिन के होते हैं — सौर वर्ष से कोई ग्यारह दिन कम। इसी कमी के कारण कोई तिथि हर साल एक ही अंग्रेज़ी तारीख़ पर नहीं बैठ सकती। वह हर वर्ष लगभग ग्यारह दिन पीछे खिसक जाती है, और फिर कुछ वर्षों के अंतर पर एक अतिरिक्त मास — अधिक मास — जोड़कर दोनों कैलेंडरों को फिर से बराबर कर लिया जाता है। होली, दीवाली और बाक़ी सारे त्योहार भी इसीलिए अंग्रेज़ी कैलेंडर पर हर साल अलग-अलग दिन पड़ते हैं, एक जगह टिकते नहीं।
दीवाली हर साल एक ही अंग्रेज़ी तारीख़ पर पड़े, ऐसी उम्मीद कोई नहीं करता। श्राद्ध तिथि भी ठीक इसी तरह, ठीक इसी कारण से चलती है। यह बात समझ आ जाए तो फिर इसमें कोई रहस्य नहीं बचता।
तिथि क्या है, और पक्ष का क्या अर्थ है
तिथि न सप्ताह का कोई दिन है, न सामान्य अर्थ में कोई तारीख़। वह चंद्रमा के बढ़ने या घटने की एक अवस्था है। चंद्र मास तीस ऐसी अवस्थाओं में बँटा है — पंद्रह चंद्रमा के बढ़ते समय की और पंद्रह घटते समय की — और इनके नाम जाने-पहचाने हैं: प्रतिपदा, द्वितीया, तृतीया, और इसी क्रम में आगे, उजले पक्ष में पूर्णिमा तक और अँधेरे पक्ष में अमावस्या तक।
ये दो आधे हिस्से ही पक्ष कहलाते हैं। शुक्ल पक्ष उजाले का पखवाड़ा है, जब चंद्रमा बढ़ते हुए पूर्णिमा की ओर जाता है। कृष्ण पक्ष अँधेरे का पखवाड़ा है, जब वह घटते हुए अमावस्या की ओर बढ़ता है। परिवार अक्सर यही बात भूल जाते हैं, और भूलना भारी पड़ता है — क्योंकि हर तिथि का नाम महीने में दो बार आता है, एक बार हर पक्ष में। सिर्फ़ सप्तमी कह देना काफ़ी नहीं। कृष्ण पक्ष की सप्तमी और शुक्ल पक्ष की सप्तमी दो अलग दिन हैं, आपस में लगभग पंद्रह दिन का फ़र्क़।
इसलिए जो उत्तर आप ढूँढ़ रहे हैं उसके हमेशा तीन हिस्से होते हैं, एक नहीं: चंद्र मास, पक्ष और तिथि। आश्विन कृष्ण चतुर्थी — यह पूरा उत्तर है। अकेली चतुर्थी पूरा उत्तर नहीं है।
श्राद्ध तिथि पर होता है, अंग्रेज़ी सालगिरह पर नहीं
कर्म उसी तिथि से जुड़ा है जिस दिन उनका देहांत हुआ था, और आगे हर वर्ष उसी तिथि से। शास्त्र यही कहते हैं और हर पुरोहित आपसे यही पूछेंगे। अंग्रेज़ी तारीख़ का काम बस इतना था कि उसने वह क्षण दर्ज कर लिया। कर्म असल में तिथि पर ही टिका है।
जो परिवार तिथि की जगह अंग्रेज़ी तारीख़ पर करता है, वह अनादर नहीं कर रहा — बस उसके हाथ में ग़लत पैमाना है। अधिकतर वर्षों में वह अंग्रेज़ी तारीख़ किसी और ही तिथि पर पड़ेगी, और जिस वर्ष दोनों मिल जाएँ वह संयोग भर होगा। अच्छी बात यह है कि इसे सुधारने के लिए पिछला कुछ मिटाना नहीं पड़ता। एक बार तिथि निकाल लीजिए, और उस वर्ष से आगे परिवार सही दिन पर करने लगेगा।
तरीक़ा: अंग्रेज़ी तारीख़ से तिथि तक
तरीक़ा छोटा है, और जिस एक बात में लोग चूकते हैं वह है वर्ष। पहले मृत्यु की ठीक-ठीक अंग्रेज़ी तारीख़ लीजिए — मृत्यु प्रमाणपत्र में यह लिखी होती है, और यही एक काग़ज़ है जो लगभग हर परिवार सँभालकर रखता है। उस पर लिखा वर्ष ध्यान से देख लीजिए। अब उसी वर्ष का पंचांग या हिंदू कैलेंडर खोलिए — इस वर्ष का नहीं — और उसमें वह तारीख़ देखिए। उसमें उस दिन का चंद्र मास, पक्ष और तिथि मिल जाएगी। यही संयोग आपकी श्राद्ध तिथि है, और आगे हर वर्ष इसी पर कर्म होता है।
इस वर्ष के कैलेंडर में देख लेना सबसे आम ग़लती है। इस वर्ष का कैलेंडर यह बताता है कि आज उस अंग्रेज़ी तारीख़ पर कौनसी तिथि पड़ रही है — यह अलग सवाल है और उत्तर भी प्रायः अलग निकलता है। देखना उसी वर्ष के पंचांग में है जिस वर्ष देहांत हुआ था।
इससे पहले दो रास्ते और आज़मा लेने चाहिए। कई घरों में तिथि किसी डायरी, बही, फ़ोटो के पीछे या काग़ज़ों के साथ रखी किसी पर्ची पर लिखी होती है — एक बार ढंग से ढूँढ़ लेना चाहिए। और घर के पुरोहित जी, जिन्होंने अंत्येष्टि या तेरहवीं का कर्म कराया था, उनके अपने रजिस्टर में यह अक्सर दर्ज रहती है। वहाँ एक फ़ोन कर लेने से बात मिनटों में तय हो जाती है।
दो पंचांगों में तिथि अलग-अलग दिन क्यों दिख जाती है
तिथि रात बारह बजे शुरू नहीं होती और चौबीस घंटे की भी नहीं होती। वह उसी समय शुरू और समाप्त होती है जब चंद्रमा उस अवस्था तक पहुँचता है — यानी कोई तिथि एक दिन दोपहर में शुरू होकर अगले दिन सुबह ख़त्म हो सकती है। कोई बीस घंटे चलती है, कोई छब्बीस।
अब जब तिथि दो अंग्रेज़ी दिनों पर फैली हो, तो श्राद्ध किस दिन होगा? नियम यह है कि कर्म के लिए जो समय निर्धारित है, उस समय जो तिथि चल रही हो वही ली जाती है। श्राद्ध अपराह्न काल में — यानी दिन के तीसरे प्रहर में — किया जाता है, इसलिए उस समय जो तिथि विद्यमान हो वही मानी जाती है। यह तय परंपरा है, किसी की पसंद का मामला नहीं।
इसी कारण दो पंचांगों में एक ही तिथि एक दिन आगे-पीछे भी दिख जाती है। सूर्योदय और अपराह्न का समय स्थान के अनुसार बदलता है, और अलग-अलग पंचांग अलग-अलग स्थानों और थोड़ी भिन्न गणनाओं से बनते हैं। इसमें किसी की लापरवाही नहीं। ऐसा अंतर दिखे तो वही पंचांग मानिए जो आपके घर में या आपके पुरोहित जी के यहाँ सदा से चला आया है — और हर साल पंचांग बदलने के बजाय उसी पर टिके रहिए।
उलझन वाली स्थितियाँ, साफ़-साफ़
रात बारह बजे के बाद, पर सूर्योदय से पहले हुआ देहांत। सही स्थानीय तारीख़, समय और स्थान बताइए। पंचांग का दिन सूर्योदय से गिना जाता है, लेकिन मृत्यु तिथि वही है जो देहांत के वास्तविक क्षण में चल रही थी। पिछले सूर्योदय पर दी गई तिथि अपने आप न मान लें; रात में तिथि बदल सकती है। पुरोहित से उस समय की तिथि का आरंभ और अंत जाँचने को कहिए।
किसी वर्ष तिथि का क्षय हो जाना। तिथियाँ दिन से छोटी होती हैं, इसलिए कोई तिथि सूर्योदय के बाद शुरू होकर अगले सूर्योदय से पहले समाप्त हो सकती है — तब वह किसी दिन के हिस्से में आती ही नहीं। इसे क्षय तिथि कहते हैं, और उस वर्ष आपकी तिथि कैलेंडर में दिखेगी ही नहीं। इससे कर्म रुकता नहीं — न वह छोड़ा जाता है, न अंग्रेज़ी तारीख़ पर खिसकाया जाता है। पुरोहित जी शास्त्र के नियम से दिन तय कर देते हैं, प्रायः वही दिन जिसके अपराह्न में वह तिथि चल रही हो। यह बात पूछ लीजिए, अपने आप तय मत कीजिए।
दो दिन पर फैली तिथि, या दो बार आ जाना। यह उसी सिक्के का दूसरा पहलू है: कोई तिथि इतनी लंबी हो कि दो सूर्योदय छू ले तो कैलेंडर में दोनों दिनों के सामने दिखती है, और कभी-कभी एक ही तिथि लगातार दो दिन गिनी जाती है। ऊपर बताया अपराह्न वाला नियम ही इसका निर्णय करता है। परिवार को संदेह हो तो पुरोहित जी से एक बार पूछ लेने पर उस वर्ष का दिन तय हो जाता है।
जब सिर्फ़ महीना याद हो — या कुछ भी याद न हो
कभी-कभी परिवार को बस इतना याद रहता है कि सावन के आसपास हुआ था, या ठंड में, या किसी त्योहार के कुछ दिन बाद। यह जितना लगता है उससे ज़्यादा काम की बात है। इसके साथ जो भी बचा हो जोड़िए — अस्पताल का बिल, बैंक का कोई पत्र, पुराना पासपोर्ट, अदालत या ज़मीन के काग़ज़ में कहीं ज़िक्र, किसी फ़ोटो का साल — और अक्सर बात एक चंद्र मास तक सिमट आती है। आगे दिन कैसे तय हो, यह पुरोहित जी बता देते हैं। ऐसी स्थिति के कई परिवार वार्षिक कर्म उसी मास की अमावस्या को कर लेते हैं।
और जब कुछ भी याद न हो — न तारीख़, न महीना, न वर्ष, जैसा परदादा-परदादी और दो-तीन पीढ़ी पहले के पितरों के साथ होता ही है — तो परंपरा ने इसका उपाय पहले से रखा है। सर्व पितृ अमावस्या, पितृ पक्ष का अंतिम दिन, उन सभी पितरों के लिए नियत है जिनकी तिथि अज्ञात है, भूल गई है या छूट गई है। एक ही दिन में पूरा वंश उसमें आ जाता है। इस दिन के बारे में और परिवार इसे कैसे करते हैं, यह इसी वेबसाइट के एक अलग लेख में समझाया गया है।
यानी तिथि न मालूम होने से कोई परिवार कर्म से वंचित नहीं रहता। बस परंपरा उसे किसी और दिन की ओर भेज देती है।
अंदाज़ा मत लगाइए, पूछ लीजिए — और फिर लिख लीजिए
अगर परिवार ख़ुद तिथि न निकाल पाए तो गयावाल तीर्थ पुरोहित अंग्रेज़ी तारीख़ से यह निकाल देते हैं। उन्हें मृत्यु की ठीक तारीख़, वर्ष, और काग़ज़ों में समय लिखा हो तो समय भी बता दीजिए — और स्थान भी, क्योंकि सूर्योदय हर शहर में अलग होता है। उस वर्ष का पंचांग देखकर पीछे लौटना उनके लिए रोज़ का काम है और इसमें समय भी कम लगता है।
एक बात साफ़ कह देनी चाहिए: अंदाज़ा लगाना पूछ लेने से बुरा है। कोई तिथि इसलिए चुन ली जाए कि लगभग वही लगती है, या किसी भाई को शायद याद है, या अंग्रेज़ी तारीख़ याद रखना आसान है — तो वही अगले पचास साल के लिए घर की तिथि बन जाती है, और हर वर्ष वही चूक दोहराई जाती है। एक बार पूछ लेने से बात हमेशा के लिए तय हो जाती है। न जानने में कोई संकोच की बात नहीं; गया आने वाले अधिकतर परिवारों के पास यही कमी होती है।
और जब मिल जाए, तो अगली पीढ़ी के लिए वह कर दीजिए जो आपके लिए किसी ने नहीं किया। पूरा लिखिए — चंद्र मास, पक्ष और तिथि — साथ में मृत्यु की अंग्रेज़ी तारीख़ और वर्ष भी, और इसे वहीं रखिए जहाँ घर के काग़ज़ रहते हैं। भाई-बहनों और बच्चों को भी भेज दीजिए। आज लिखी दो पंक्तियाँ आपके पोते-पोतियों को यह पूरी खोज करने से बचा लेंगी।